Weaver Poem – यू तो बुनकर है – Poem on Emotions

Weaver Poem – Poem on Emotions

Weaver Poem

यू तो बुनकर है वो गजब का,
रफूगर भी कुछ कम नही,
न जाने कहाँ से ले आता है,
वो डोरा सपनो का टांक देता है इंद्रधनुषी पैबंद,
चीथड़ों पर कुछ इस तरह,
कि हों पर सुरखाब के।

सृष्टि के “प्रथम” पुरुष सा,
नाप लेता है बड़ी सहजता से,
वो नाभि की गहराई, ठोडी की ऊँचाई,
माया, मोह, भोग, संभोग, आध्यात्म और मोक्ष,
सब कुछ है उसके अधीन।

नही लांघ पाया था वो,
तो बस, उदासीन आँखों के घेरे काले घेरे,
और कोरों पे पड़ी सिलवटें,
गालों की झाइयां,
उम्र और इंतजार की सौगात,
माथे की महीन लकीरे और झुरीयों वाली,
पढ़ी जा चुकी पुरानी उपन्यास सी,
मोबाइल, टैब के जमाने मे,
लैंड लाइन वाले,
उँगलियों से गोल गोल,
घुमा घुमा डायल किये,
जाने वाले टेलीफोन सी,
वो सृस्टि की” प्रथम” स्त्री को।

न पहचान सका देह, प्रेम, समर्पण और उम्र के संबंध को।
हाँ वो सृष्टि के आरंभ से अब तक का पुरुष।


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