Women Empowerment Poem – हर बार इसी तरह – Women Poem

Women Empowerment Poem – Poem on Women in Hindi

Women Empowerment Poem

हर बार इसी तरह,
कभी जानबूझ कर,
कभी अनजाने में,
दे जाता था कोई न कोई विषय,
पागल बन सोचने के लिये।

हर रोज बात करना,
चर्चा करना राजनीति से लेकर, मनुष्य हृदय,
सिनेमा, कोई कहानी,
लेखक हो या महानगरों के दमघोटू रोजमर्रा कर,
भागा दौड़ी या फिर हो महिलाओं के हक,
अधिकार तरक्की या खोखलेपन की दास्तान।

कभी दोस्त सा,
तो कभी दार्शनिक सा,
कभी एकदम सामान्य,
तो कभी कभी अलग सा विचित्र प्राणी लगता।

परिपक्वता उम्र की मोहताज नही होती,
ये आती है समय और अनुभवों से,
शायद इसलिये था वो ऐसा।
चल पड़ी थी एक ऐसी यात्रा पे उसके संग जो,
ज्यादा लंबी न होकर,
होती कभी पंद्रह मिनट ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे की,
उससे ज्यादा नही।

कई रास्ते बड़े छायादार और जीवंत होेते है,
वो मंजिलो के मुरीद नही होते।
मंजिल अंत है, खोज और बेचैनी का।
बेचैनी सूचक है जिंदा रहने का।

इसलिये नही थी चाह उसे ले मंजिल तक पहुचने की।
चलते रहना चाहती थी,
हर रोज संग थोड़ा-थोड़ा।
बातो बातो में कह गया वो एक दिन,
क्या बचा अब तुममे?

भीतर तक भेद गए उसके शब्द,
क्यों कहा उसने नही जानती।
बस खोजने लगी उम्र के इस पड़ाव में उस “क्या” को।
फिसलती उम्र और चेहरे पर पड़ती झुरीयों की चीख को कुचल,
पार खुद की तलाश अब आसान नही थी,
पर नामुमकिन भी नही।

माँ, थी पत्नी थी, बहु थी,
खुद क्या हूँ ढूंढने लगी खुद में।
शायद यही बेचैनी रही होगी
उस बुद्ध को जिसने उन्हें घर छोड़ने औऱ खोजने को,
मजबूर किया खुद को।

खुद को खंगालना आसान नही होता,
सो झाँकने लगी खुद के भीतर।
स्वयं खिंची लछमन रेखा,
जो पार करना था।

सालों से बंद पड़ा,
बड़े से पुराने जंग लगे दरवाजे वाला,एक कमरा मिला।
ऊँची सी देहरी पार कर दरवाजे,
को खोलने की कोशिश की।
कई धक्कों प्रयासों के बाद चरररर की आवाज के साथ जो खुला।

तमाम जालों को हटाते हुए,
अंदर प्रवेश किया तो,
धूल और मिट्टी के उड़ते ही एक अजीब भस भर गई,
नथुनों में दम घुटने से खाँसी आने लगी जोरो से।
अजीब सी सीलन से भरे उस कमरे में मिली एक
कोने में जूट की बोरी,
काले डोरे से बंधी।
छूते ही उसे धूल की झोका सा उठा।
साँस रोककर उसे खोला।
चोंक गई उसे देख।

सब भूल अनोखी चमक सी चोंधिया गई आँखें।
बहुत कुछ मिला खोया छुटा हुआ उसके भीतर।
ले आई उसे घसीट के बाहर,
खोया खजाना जैसे हाथ लगा हो।

टूटे खिलोने बीता बचपन,
जवानी की यादें अल्लहड़पन,
सूखे फूलों की पंखुड़िया,
पुराने ग्रीटिंग कार्ड कुछ पुराने खत,
एक नीली डायरी, उसमे लिखी कई शैतानियां,
कुछ रिकार्डेड गाये गानों के कैसेट कुछ आंसुओ से धुले मिटे शब्द,
और कई बिखरे स्वर व्यंजन,
किसी की मात्रा टूटी तो किसी का हलंत गाय बिखरे से।

सब को बड़े सहेज कर बाहर निकाला,
कपड़े से धीरे धीरे पोछ कर साफ किया,
और धूप में सुखाया उस सालो की सीलन को।
आज पोछ कर ढूढ पाई खुद में बचे हुए “मैं” को।
मिले उस पेन को साफ कर स्याही भरी,
जोड़ने लगी उन टूटी वर्णमाला को कुछ रूठे से, अनमने से,
मना ही लिया आखिर में।
कुछ टेढ़े मेढे हुए,फिर खुद बखुद जुड़ अर्थ ढूढने लगे।

आज खुश हूं उस वाक्य का,
अर्थ समझ पाई ढूढ पाई,
खुद में बचा “क्या” को।