Zindagi Poem – मुश्किल था अमृता बन पाना – Life Poetry

Zindagi Poem – Life Poetry in Hindi

Zindagi Poem

हाँ, मुश्किल था अमृता बन पाना,
तो कहाँ है आसान इमरोज बन जाना।
उगते सूरज और चढ़ती उम्र में तो सब दहकते है,
बड़ा मुश्किल है, ढलती शाम उतरती उम्र पे भी,
उसका यूँ, निसार हो जाना।

गर है कठिन बहुत अपने,
प्रेम को दुनिया को दर्शाना,
तो कहाँ है आसान,
किसी गैर के जहर को,
मुस्कुरा के यू घूँट घूँट गटक जाना।

वो तन्हा थी, वो अकेली थी,
सबने उसके दर्द को पहचाना,
बना वो उस का सहारा,
कहाँ था आसान “बैसाखी” के,
लिये भी प्रीत को अपनी यूँ छुपा पाना।

मुश्किल था किस्सों को,
आसमान पर लिखना,
तो कहाँ था आसान इंद्रधनुष से,
चुरा रंग उसके किस्सों को,
कैनवास पर उतार लाना।

था बड़ा मुश्किल,
ले कालिख, काजल से,
उदास रातो को,
चीखते झिंगुरों की टीस,
सफेद पन्नो पर उतारना।

तो कहाँ था आसान, उसके आँसुओ को,
अपनी कमीज की आस्तीन में समेट,
खुद के आँसुओ को रुंधे कंठ के भीतर ही रोक पाना।

हाँ मुश्किल था बहुत अपूर्ण,
जीवन को पूर्ण बनाना,
कहाँ आसान था उसके आधे को,
पूरा करते हुए खुद चौथाई रह जाना।

मुश्किल था बहुत अकेली औरत का,
संघर्ष कर शिखर को पाना,
तो कहाँ था आसान काँधे को बना,
सीढ़ी उसे ऊपर तक पहुँचाना।

त्याग देते है, सगे-संबंधी रिश्तेदार,
हार जाते है हाथ पैर और स्वास्थ,
हाँ तब भी तो तुम ही थे,
जो बिना बाँधे बंधन में,
अंतिम सांस तक साथ निभाया।

बन जाएंगी और भी “अमृता” पर,
मुश्किल है बहुत अब इमरोज,
“तुम” किसी का बन पाना।


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